कुछ 'मुखड़े' मेरे भी हैं...!
कुछ 'मुखड़े' मेरे भी हैं, हुक 'लाईनें' भी...! कुछ 'नगमें' मेरे भी हैं, कुछ 'आईनें' भी...! यूँ गुले बहार में, ख़ाब खिले फ़िर बिखरे मीरे चेहरे पर ,तिरे रंग और भी निखरे यादों के दरीचे में, बहती हवाओं में तिरी वफ़ाई में दौड़े - दौड़े और ठहरे कुछ 'मक़सद' मेरे भी हैं , कुछ 'माईनें' भी कुछ 'नगमें' मेरे भी हैं, कुछ 'आईनें' भी...! क्यूँ दिल लगाया, पलकों में जाके खोई, और शिक़वे में बहकर छुप - छुपाती रोई लिख न पाया सनम ख़य्याम की रुबाई...! यह कैसी सोहबत तेरी कैसी रुसबाई...!! कुछ 'जुमलें' मेरे भी हैं, कुछ 'लाईनें' भी कुछ 'नगमें' मेरे भी हैं, कुछ 'आईनें' भी...! किनारा मिले ना मिले, दूर तलक जाना है, नज़रें मिले ना मिले, अब यही हर्ज़ाना है क्यूँ मुझसे दूर रहकर मेरी ही सोंचती हो तुम्हारी इल्मियात पे रहना गुजर जाना है कई 'क़िस्में' मेरे भी हैं, 'मुआयनें' भी कुछ 'नगमें' मेरे भी हैं, कुछ 'आईनें' भी...! - देवाशीष सरकार