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हमको मधुमय तो कर डाला

हमको मधुमय तो कर डाला है दिवा - रात्रि का यह पाला किंचित - क्योंकर ,मैं क्या बोलूँ यहॉं ग़म हैं हसीं और सुख काला हम मर - मरते फिर जीते हैं, फटेहाली कैसे सियेंगे...! बिलायती कईसे पीयेंगे, घर वाले भी तो जियेंगे...! है रोज़ - रोज़ पचड़े में सच 'अमन - चैन' की यह माला         हमको मधुमय तो कर डाला         है दिवा - रात्रि का यह पाला... मुनिया बन - ठनकर बैठी है पापा घर को कब आएंगे तब हाट - बजरिया - मेले में लिए हमें घुमाने जाएंगे इस दिनों - दिन के 'खंजर' का यह सही बना विष का प्याला         हमको मधुमय तो कर डाला         है दिवा - रात्रि का यह पाला... सपनें देखो बेहतर - बढ़कर, हम मर जो गए ख़ुशहाल कहो...! गरीबी की इस 'गर्दिश' में, है दुःख जो सभी फ़िलहाल सहो...! हैं किसम - किसम के लोग यहाँ  अभी 'अंधभक्ति' में 'मधुशाला'         हमको मधुमय तो कर डाला         है दिवा - रात्रि का यह पाला... हमरे 'सपनों' की 'गाथा' में इक रोज़ 'मसीहा' आएगा इन चुभ रहे 'जंजालों' से 'मुक्ति' हमको दिलवाएगा अ...