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दिसंबर 5, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जब साँस नहीं तब आस कहाँ...(कविता )

  जब साँस नहीं , तो आस कहाँ, कोई बात नहीं , अहसास नहीं ! अब साँस रूके , तब साँस रूके, दुनियाँ में कुछ भी रास नहीं ! साँसें बिकती है रोज़ यहाँ, जब कोई मसीहा मिलता है ! ऐ नाथ मेरे, बस साथ तेरे कोई अंग - अंग को सिलता है ! सब लाश हो तुम, क्या लाश यहाँ क्या हमदर्दी कुछ पास नहीं      जब साँस नहीं , तो आस कहाँ,      कोई पास नहीं , कुछ ख़ास नहीं !      अब साँस रूके , तब साँस रूके,      दुनियाँ में कुछ भी रास नहीं ! अपनी साँसों की गिनती में हक़ और किसी का छीनते हो मौक़े - मौक़े को ढूंढ - ढूंढ, पापों को इसमें बीनते हो ?! क्या और कहीं ,कोई 'ठौर' यहाँ, जो दीन - धरम हो ख़ास वहीं     जब साँस नहीं , तो आस कहाँ,     कोई पास नहीं , कुछ ख़ास नहीं !    अब साँस रूके , तब साँस रूके,     दुनियाँ में कुछ भी रास नहीं ! प्रकृति की जड़ से मत खेलो, क्या पेड़ - परिंदे चीज़ नहीं ! अब 'रब' से थोड़ा 'डर' भी लो,  'निश्छेद' नहीं , कोई 'तीज' नहीं ! जीते हैं सभी, क्यों ख़ुद में यहाँ , मरते - मरते कोई 'दास' नहीं    ...

आज भी ऑंखें ढूंढ रही है...(कविता)

  आज भी ऑंखें ढूंढ रही है , अंतरालों पर मूँद रही है ! शब्दों के परतों में घुलकर बेचैनी से ढूंढ़ रही है...!! मैं बिसरकर जन्मभूमि को, चल पड़ा था कर्मभूमि को हर किसम के लोग यहाँ पर मोह लिए फ़िर वे हमीं को एकाकी में कमी जो उनकी झन्नाहट को जूझ रही है...              आज भी ऑंखें ढूंढ रही है ,              अंतरालों पर मूँद रही है !              शब्दों के परतों में घुलकर,              आवेगों में ढूंढ़ रही है !! ऑंखों में हैरानी तब थी मुझसे दूर चले जाने को सर्द हवाएं सरक चुकी थीं उस मौसम के खिल आने को पास बिठाने की तबियत से , नज़रें उनको ढूंढ रही है...              आज भी ऑंखें ढूंढ रही है ,              अंतरालों पर मूँद रही है !              शब्दों के परतों में घुलकर,              आवेगों में रूँध रही है !! नक्श - ओ - नूर...