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थिएटर फ़ोबिया - "फ़्लैश बैक"(कविता - पार्ट : -- 1.)

  थिएटर फ़ोबिया - "फ़्लैश बैक" ( कविता - पार्ट : -- 1.) ---------------------------------- एक गुज़ारिश बार - बार है, सुनिए जी 'ज़िला - जवार'...! बुद्धिजीवी हम नहीं थे, हम तो सीधे - साधे थे'गंवार'...!!     'गुस्ताख़ी' को माफ़ करना,     हे हितकर , 'गुणीजण' मेरे...!     बातों को जो बुन रहा हूँ,     दिल में बसे जो बहुतेरे...!!       'नाट्यविधा' से 'प्रेम' हुआ था,   'चरमसीमा' के मौसम में...!   'पालकी' , 'माटी - गाड़ी' होता,   ज़ुबाँ - ज़ुबाँ पर 'ऑसम' में...!!   मंच रमें थे 'सतीश बाबू' ,   'बैट' में थे 'मुखर्जी बाबू'...!   देख मेरे दिल में तब आया,   दे दूँ मैं भी 'अर्ज़ी' बाबू...!!   'बैट - मेट' में सब 'सेटिंग' था,   भारी था, "कला - संगम"...!   भईया मैं किसके संग बैठूँ...?   बन 'बिसरा' था तब 'जंगम'...!!        बड़े - बड़े 'कला के पंडित',  माहिर भईया 'सुलभ जी'...!  काम मिलना बड़ा कठीन था,   का 'कोरस' में 'झुलब' ज...