मुद्दत बाद किसी ने....
मुद्दत बाद किसी ने, मिरे दीदों में आके झाँका, यूँ समझो यारो मुझे, 'लाखों - करोड़ों' में आँका ! जाहे क़िस्मत मिरे दिल की बातें , सुहानी शाम और उनकी सौग़ातें अभी ताज़ी थी जैसे मिरी कहानियां, उनकी 'तड़प' में 'तलब' बढ़ातें हिली ज़मीं भी थी, आसमाँ आँका - बाँका... यूँ समझो यारो मुझे, 'लाखों - करोड़ों' में आँका ! मुद्दत बाद किसी ने, मिरे दीदों में आके झाँका... ख़त्म हुई थी कहकहे - हर बंदिश, जो रचाई ग़ैरों ने तंग दिल से रंजिश! ख़ुदा बचाए मिले न कभी किसी को..., मुक़ाम - ए - हक़ में बनी - बनाई थी साज़िश बोलता था मिरे लिए, चौराहे - हर नाका यूँ समझो यारो मुझे, 'लाखों - करोड़ों' में आँका ! मुद्दत बाद किसी ने, मिरे दीदों में आके झाँका... ज़िंदादिली थी , उनकी लबों में भी, थी ख़ुशबू हुए बाग़ - बाग़ उनसे, हुए जो हम कल उनसे रूबरू टिमटिमाती रोशनी की आतिशबाज़ियाँ बलखाती आई, कुछ करती गुफ़्तगू रफ़्तार-ए- हस्र को भागती गश्त ने ...