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इक आराधना है तू...

इक आराधना है तू...! मेरी माँ के तुल्य इक माँ भी है तू... तू रहे जिधऱ मेरी माँ भी वहाँ.., उसे छू सकूँ कि वह माँ भी है तू...! शरारत भी मेरी भायी बहुत...! कह न सकी मैंने खायी बहुत, तपते बदन को ठंडक देती, अब वो तो नहीं कि साया बहुत...!! सब साधना है तू... मेरी सिमटी हुई हर कामना है तू... अँधियारे में तब रौशनी बनी थी  इन आँखों का खिल आना है तू... आँचल में सब मौसम देखा , रज़ाई की भी ऊष्मा फीका...! ऊँगली पकड़ा गिनती गिनता, आ - ऊ, करता बोली सीखा...!! इक पालना है तू... मेरे रोते ह्रदय से पुकारना है तू.., तुझे खोकर मैं पछताऊं कहाँ, अब अंतर्मन की उजालना है तू...! -- देवाशीष सरकार.

आज मगन मस्त पवन

आज मगन मस्त पवन, मन में लहराए अगन  ! छंदों में प्यार खिले , फूलों के अंग - बदन  !! बलखाई आज 'शमां', मौज़ें बन, ताज़ 'जवां ' ! हर इक आवाज़ से ही , सिहरन हो जाए रवां  !! आज मस्त शाम सुमन , बरसे - बरसाए नयन  ! बहका मदमस्त ह्रदय  बिसरे हैं मोंह - वचन  !! हम सब हैं कौन यहां , सब तो हैं मौन यहां...! अपने कहलाए जो हैं, भागे हैं छोड़ जहां...!! आज पतन, मंद गठन , आदर्श नहीं है लगन ...!!  ना है विचार मनन , दृश्यहीन है जन - जन ...! -- देवाशीष सरकार.