संदेश

अगस्त 9, 2022 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नशे का ख़ुमार

उस रात नशे के ख़ुमार ने,  गज़ब का कहर ढाया था  ख़ुद ही से ख़ुद को चुराकर..., 'नाज़ुक' हमें बनाया था ! हमनें अपने लिए भी , उसी दिन सोंचा था मगर... हवाओं के थपेड़ों ने, हमारा रूख़ अलग कराया था ... था मजबूर , थी बेहयाई भी...,  लोगों के नज़रिए से दूर... मिराज़ खिल आया था... 'रेगिस्तान' के कँटीले पौधों ने,  अपने काँटों को ताने 'बेख़ौफ़' मुझे देख रहे थे... कि, एकाएक , रूहानी 'ताक़तों' ने भी, कुछ वयां कराया था !!! क्या काबिलियत नहीं थी ,मुझमें जो मैं यूँहीं गिरा हुआ था...! वो सारे लोग मुझे घूर रहे थे..., उन सभी ने मुँह को मोड़ा था...! कभी मैं भी अरमानों से झूला बनाऊँगा हर किसी को उसपर झुलाऊँगा अपनापन सा होगा उसमें , न कि 'फ़र्ज़ी' बातों पर..., चाँदी का 'अर्क' लगाऊँगा...!!! -- देवाशीष सरकार