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इन 'वादियों' का 'क्या' कहना...,

 इन 'वादियों' का 'क्या' कहना..., 'यहीं' कहीं 'खो' जाने को, 'जी' चाहता है ! 'हवाओं' की 'मस्ती'..., 'मौज़ों' की 'रवानी' में...! इक - इक 'पल' यहाँ , नई - नई , रह - रहकर कोई..., 'कहानी' सुनाती है ! 'ख़ाबों' ने भी यहीं आकर , अपना 'डेरा' डाल दिया है ! 'रातों' की 'ख़ामोशी' में , 'परियाँ' यहीं 'उतर' आतीं हैं ! और..., इन 'फ़िज़ाओं' में , 'इत्र' घोलकर... हमें 'मदहोश' कर जातीं हैं ! पौ फ़टने से पहले ही, चिड़ियों का कोलाहल..., 'बेचैन' किए जाता है ! कितना भी 'कोई'...,  'नशे' में क्यों न 'खो' जाए उसका 'ख़ुमार' टूट जाता उसमें 'ताज़गी' भर आती है ! -- देवाशीष सरकार