इंसानों को एक इशारा काफ़ी है.
इंसानों को एक इशारा काफ़ी है, कुछ भी कह ले यह ज़माना माफ़ी है. उनको तो सबर नहीं दिन - रातों का. हम जैसों के ख़ाबों की इज़ातों का. दिल से जो भी उतर रहे हों , वक़्त आने पर कहने का. कोई भरता, कोई करता, इस कलयुग में सहने का. होती जो तौहीन यहाँ की ट्राफ़ी है, इंसानों को एक इशारा काफ़ी है. कुछ भी कह ले यह ज़माना माफ़ी है. उनको तो सबर नहीं दिन - रातों का. हम जैसों के ख़ाबों की इज़ातों का. भाग भाग ये मृग भला, कस्तूरी पहचानेगा. नाभी में जो महक रही हो , क्या उसको झुठलायेगा. क़ीमत न हो अब यहाँ इंसाफ़ी है. इंसानों को एक इशारा काफ़ी है. कुछ भी कह ले यह ज़माना माफ़ी है. उनको तो सबर नहीं दिन - रातों का. हम जैसों के ख़ाबों की इज़ातों का. अपनों की बातें ना समझे, अपनापन जतलायेगा. हमराही वो कभी नहीं है, वो हमको भटकाएगा. अच्छाई की क्या सज़ा ये जाफ़ी है. इंसानों को एक इशारा काफ़ी है. कुछ भी कह ले यह ज़माना माफ़ी है. उनको तो सबर नहीं दिन - रातों का. हम जैसों के ख़ाबों की इज़ातों का. - देवाशीष सरकार