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'पारस पत्थर' से 'दोस्त' - (कविता)

 'पारस पत्थर' से 'दोस्त' ---------------------------------   'पारस पत्थर' से दोस्त हो,   तुम सभी ...!!!   तुम्हें भूल सकूं भी , तो कैसे... ???   अपने 'दायरे' में,   क़ैद पड़ा हूँ...!!!   कैसे 'तौल' सकूंगा,    अपने चंद 'पैसों' से...???   'उमर' - 'होने' को है,   'अकड़' ढ़ीली पड़ गई 'घुटने और 'कमर' की...!   कमज़ोर नज़रें , उदर में 'अपच',    कभी 'उस्म', 'ठंडी', बसंत बहार,    धू - धू , धधकती आग,    उसपे 'कहर' , 'समर' की...!!   'अफ़सोस' नहीं कोई ,   बस, 'एहसास' सा होता है...!   जब 'रात' में कोई,   तुम्हारी ही 'यादों' के पलों में;    तुम्हें 'बांचता' हुआ सोता है...!!   न होते तुम सभी...,   तो , मैं भी होता 'गर्दिश' में कहीं!   तुम्हारी 'छुअन' से ही,   'सोने' का बना हूँ अभी...!!   सुन लो भई , मेरी आख़री बात,    अबकी बार  'बारिश' के दिन... ,   'आसमान' में देखते रहना...!    कोई 'पत्थर' , 'अजू...