अन्तर्मन का भाव
यह सच है कि, इस दुनियां में कोई भी इंसान ज़्यादा दिनों के लिए नहीं आया है ! पर , रिश्ते - नाते , खुद की 'प्रसिद्धि - उपलब्धि', इत्यादि के लिए इंसान 'लालच' में पड़ जाता है ! कमोवेश , सभी के दिल में यह 'लालच' ,थोड़ी बहुत सही रहती ही है ! जब दुनियाँ में इंसान के संबंध बढ़ते जाते हैं और प्रगाढ़ता भी बढ़ती जाती है - तब उसका मन उन सब चीजों के प्रति आकर्षित होने लगता है और इंसान अपने 'मोह' में जाकर बंध जाता है ! इसी 'मोह' से किसी के प्रति 'प्रेम' की उत्पत्ति होती है और हम जिस किसी से भी 'प्यार' क्यों न करते हों ! उसके लिए कुर्वान होते हैं ! उसके सुख - दुःख से , आपरूपी या कहें, 'ख़ुद - ही खुद' से 'इक भाव', 'हृदय' से 'मुखड़े' तक उभर आती है...! दोस्तों , यह मेरे 'अंतरमन का भाव है'! इन सारी परिस्थितियों और अवस्थाओं को मैं भी महसूस कर रहा हूँ और आपसे ज़िक्र कर भी रहा हूँ ! एक फ़िल्म की मेकिंग ऑफ़ का 'कैमरामैन' की 'हैसियत' से काम करते वक़्त प्रसिद्ध संगीतकार, 'साज़िद - वाज़िद' भाई के संपर्...