अन्तर्मन का भाव

यह सच है कि, इस दुनियां में कोई भी इंसान ज़्यादा दिनों के लिए नहीं आया है ! पर , रिश्ते - नाते , खुद की 'प्रसिद्धि - उपलब्धि',  इत्यादि के लिए इंसान 'लालच' में पड़ जाता है ! कमोवेश , सभी के दिल में यह 'लालच' ,थोड़ी बहुत सही रहती ही है ! 

जब दुनियाँ में इंसान के संबंध बढ़ते जाते हैं और प्रगाढ़ता भी बढ़ती जाती है - तब  उसका मन उन सब चीजों के प्रति आकर्षित होने लगता है और इंसान अपने 'मोह' में जाकर बंध जाता है ! 

इसी 'मोह' से किसी के प्रति 'प्रेम' की उत्पत्ति होती है और हम जिस किसी से भी 'प्यार' क्यों न करते हों ! उसके लिए कुर्वान होते हैं ! उसके सुख - दुःख से , आपरूपी या कहें,  'ख़ुद - ही खुद' से 'इक भाव', 'हृदय' से 'मुखड़े' तक उभर आती है...!
दोस्तों , यह मेरे 'अंतरमन का भाव है'! इन सारी परिस्थितियों और अवस्थाओं को मैं भी महसूस कर रहा हूँ और आपसे ज़िक्र कर भी रहा हूँ !
एक फ़िल्म की मेकिंग ऑफ़ का 'कैमरामैन' की 'हैसियत' से काम करते वक़्त प्रसिद्ध संगीतकार, 'साज़िद - वाज़िद' भाई के संपर्क में आया था और तब उनके पिताजी भी ज़िन्दा थे ! काफ़ी पारिवारिक लगे थे, सारे लोग...!
ख़ासकर उनके पिताजी और 'वाज़िद भाई' , जिनकी 'ज़िंदादिली' का मैं 'क़ायल' था और ताउम्र 'क़ायल' रहूँगा भी...!
उस फ़िल्म का नाम था 'शरारत'...!!!
इसके बाद भी कई - कई बार उनसे मुलाक़ातें हुई , उनकी शोहरत तब तक और भी बढ़ चुकी थी ! पर , 'वाज़िद भाई' में मुझे कोई बदलाव नहीं दिखा था ! वही 'अंदाज़' , वही 'प्यार' , वह हम सभी पर 'बरपाते' हुए नज़र आ रहे थे !
आज यह अचानक कैसे हो गया ; 
यह सारा कुछ इक 'सपना' सा लग रहा है ! 
मैं 'तहे - दिल' से उस 'पुण्यात्मा' और 'कला के पारखी' को श्रद्धांजलि देता हूँ ....!
साथ - ही - साथ .... , 
मेरा शत - शत नमन है , उनको...!
ईश्वर उनकी आत्मा को शाँति प्रदान करें...!

ॐ शाँति...!
ॐ शाँति...!!
ॐ शाँति...!!!

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