आज भी ऑंखें ढूंढ रही है...(कविता)

 

आज भी ऑंखें ढूंढ रही है ,

अंतरालों पर मूँद रही है !

शब्दों के परतों में घुलकर

बेचैनी से ढूंढ़ रही है...!!


मैं बिसरकर जन्मभूमि को,

चल पड़ा था कर्मभूमि को

हर किसम के लोग यहाँ पर

मोह लिए फ़िर वे हमीं को

एकाकी में कमी जो उनकी

झन्नाहट को जूझ रही है...



             आज भी ऑंखें ढूंढ रही है ,

             अंतरालों पर मूँद रही है !

             शब्दों के परतों में घुलकर,

             आवेगों में ढूंढ़ रही है !!


ऑंखों में हैरानी तब थी

मुझसे दूर चले जाने को

सर्द हवाएं सरक चुकी थीं

उस मौसम के खिल आने को

पास बिठाने की तबियत से ,

नज़रें उनको ढूंढ रही है...


             आज भी ऑंखें ढूंढ रही है ,

             अंतरालों पर मूँद रही है !

             शब्दों के परतों में घुलकर,

             आवेगों में रूँध रही है !!


नक्श - ओ - नूर उड़े हुए हैं, 

महंगे सौदे अपनाने को...! 

विरहन की बेचैनी कर गई

पानी - पानी हो जाने को...!!

गहन हृदय की गहराई में

उनकी बातें गूँज रही है...


             आज भी ऑंखें ढूंढ रही है ,

             अंतरालों पर मूँद रही है !

             शब्दों के परतों में घुलकर,

             आवेगों में रूँध रही है...!


-- देवाशीष सरकार

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