हमको मधुमय तो कर डाला
हमको मधुमय तो कर डाला
है दिवा - रात्रि का यह पाला
किंचित - क्योंकर ,मैं क्या बोलूँ
यहॉं ग़म हैं हसीं और सुख काला
हम मर - मरते फिर जीते हैं,
फटेहाली कैसे सियेंगे...!
बिलायती कईसे पीयेंगे,
घर वाले भी तो जियेंगे...!
है रोज़ - रोज़ पचड़े में
सच 'अमन - चैन' की यह माला
हमको मधुमय तो कर डाला
है दिवा - रात्रि का यह पाला...
मुनिया बन - ठनकर बैठी है
पापा घर को कब आएंगे
तब हाट - बजरिया - मेले में
लिए हमें घुमाने जाएंगे
इस दिनों - दिन के 'खंजर' का
यह सही बना विष का प्याला
हमको मधुमय तो कर डाला
है दिवा - रात्रि का यह पाला...
सपनें देखो बेहतर - बढ़कर,
हम मर जो गए ख़ुशहाल कहो...!
गरीबी की इस 'गर्दिश' में,
है दुःख जो सभी फ़िलहाल सहो...!
हैं किसम - किसम के लोग यहाँ
अभी 'अंधभक्ति' में 'मधुशाला'
हमको मधुमय तो कर डाला
है दिवा - रात्रि का यह पाला...
हमरे 'सपनों' की 'गाथा' में
इक रोज़ 'मसीहा' आएगा
इन चुभ रहे 'जंजालों' से
'मुक्ति' हमको दिलवाएगा
अब 'घाल - मेल' की 'नीति' है
'बदहाली' है बनी छाला
हमको मधुमय तो कर डाला
है दिवा - रात्रि का यह पाला...
-- देवाशीष सरकार
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