इक आराधना है तू...

इक आराधना है तू...!

मेरी माँ के तुल्य इक माँ भी है तू...

तू रहे जिधऱ मेरी माँ भी वहाँ..,

उसे छू सकूँ कि वह माँ भी है तू...!


शरारत भी मेरी भायी बहुत...!

कह न सकी मैंने खायी बहुत,

तपते बदन को ठंडक देती,

अब वो तो नहीं कि साया बहुत...!!


सब साधना है तू...

मेरी सिमटी हुई हर कामना है तू...

अँधियारे में तब रौशनी बनी थी 

इन आँखों का खिल आना है तू...


आँचल में सब मौसम देखा ,

रज़ाई की भी ऊष्मा फीका...!

ऊँगली पकड़ा गिनती गिनता,

आ - ऊ, करता बोली सीखा...!!


इक पालना है तू...

मेरे रोते ह्रदय से पुकारना है तू..,

तुझे खोकर मैं पछताऊं कहाँ,

अब अंतर्मन की उजालना है तू...!


-- देवाशीष सरकार.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

थिएटर फ़ोबिया - "फ़्लैश बैक"(कविता - पार्ट : -- 1.)

माँ ऐसी ही होती है...,

हमको मधुमय तो कर डाला