थिएटर फ़ोबिया - "फ़्लैश बैक"(कविता - पार्ट : -- 1.)
थिएटर फ़ोबिया - "फ़्लैश बैक"
( कविता - पार्ट : -- 1.)
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एक गुज़ारिश बार - बार है,
सुनिए जी 'ज़िला - जवार'...!
बुद्धिजीवी हम नहीं थे,
हम तो सीधे - साधे थे'गंवार'...!!
'गुस्ताख़ी' को माफ़ करना,
हे हितकर , 'गुणीजण' मेरे...!
बातों को जो बुन रहा हूँ,
दिल में बसे जो बहुतेरे...!!
'नाट्यविधा' से 'प्रेम' हुआ था,
'चरमसीमा' के मौसम में...!
'पालकी' , 'माटी - गाड़ी' होता,
ज़ुबाँ - ज़ुबाँ पर 'ऑसम' में...!!
मंच रमें थे 'सतीश बाबू' ,
'बैट' में थे 'मुखर्जी बाबू'...!
देख मेरे दिल में तब आया,
दे दूँ मैं भी 'अर्ज़ी' बाबू...!!
'बैट - मेट' में सब 'सेटिंग' था,
भारी था, "कला - संगम"...!
भईया मैं किसके संग बैठूँ...?
बन 'बिसरा' था तब 'जंगम'...!!
बड़े - बड़े 'कला के पंडित',
माहिर भईया 'सुलभ जी'...!
काम मिलना बड़ा कठीन था,
का 'कोरस' में 'झुलब' जी...!?
'अभय सिन्हा' के हाथ थामकर,
मंच चढ़ा फ़िर 'आदमख़ोर'...!
'नाट्य - संस्था' हाथ लगा तब ,
'पील' पड़ा बनके 'ग़मख़ोर'...!!
साल 'चौरासी', बन गया था,
युद्ध 'पलासी' का तभी !
'रोम - रोम' में भर रहे थे,
'नाट्यशास्त्र' की 'शान' सभी !!
दिन 'अजब' थे ,रात 'ग़ज़ब' थी,
'रंग - करम' के 'घेरे' में...!
कुछ बनना है - कुछ करना है
पड़ ही गया उस 'फ़ेरे' में...!!
'प्रांगण',से तब 'प्रण' किया मैं,
'नाटक' जीना - मरना है !
'संवादों' से क्या घबड़ाना ,
'शब्द - तरंग' की 'झड़ना' है !!
फूस की छत ,ज़मीं खुरदरा...!
जोश था हममें , पूरा - पूरा !
नुक्कड़ करते , गाना गाते
सबक़ था रहता रोज़ , अधूरा !
आसपास के थे लोग अजूबे ,
ढ़ेरों थे दिल के मंसूबे !
कीचड़ - पानी , तैर - सानकर,
'पूर्वाभ्यास' में सब थे डूबे !!
शान बना रेडियो प्रसारण,
गाने डायलॉग और सम्मभाषण !
गुज़र - बसर की 'तना - तनी' भी,
करती रहती 'हमिंग' - 'गुंजन' !!
जनवादी 'इरफ़ान' डटे थे,
'परवेज़ भाईया' ,'लग्गु - भग्गू' !
'देस - धरम' का सच बतलाते,
भाग जाते , सब 'पीछ - लग्गू' !
'नाटककारों ' की ताल पर,
डायलॉग बोलें, भईया हज्जू...!
खो जाते हम 'कोरस' वाले,
'लाईन' भूलते ,छू...उड़न छू... !!
नाटक में जो हम रम जाते,
घंटों बीते बैर नहीं था !
संजय भईया की कथनों पर,
ना जीओ तो, ख़ैर नहीं था !
'बिदेसिया' के 'सोनू ' बाबू,
'खगौल' वाले 'अन्नू बाबू' !
'कोरस' में 'हम' साथ गाते,
'सुर - ताल' पर रखते 'काबू'...!
बाबा जी 'संजय तिवारी',
"बाड़ी भाड़ा के दिहीं"... !?
बांग्ला में, कुछ भी कह जाते,
"हा हा , हू हू , हीं हीं हीं"...!!
'प्यारी' सुंदरी रोल निभाती,
'वंदना जी' रूलाती थीं !
'प्रिय' भईया के 'सा - प - सा' में,
'दर्शक - दीर्घा' गाती थीं !
पलक झपकते दृश्य बदलते ,
'तकनीकों' के , 'धोखे' थे !
अशोक भईया, लाईट झेलते ,
वे पल भी अनोखे थे!
आलोक भईया के समोसे,
'ब्रेक' - 'ब्रेख़्त' बन जाता था...!
'पारस' की 'दुकान' पे बन्धु,
'बकाया' चलता 'खाता' था...!!
'रंजन बाबू' , 'नौटंकी' में ,
'लूट गए क्यूँ' कहते थे !?'
अब समझा वो इसी बहाने,
'प्रेम' बहाते रहते थे !?
'अवधेश बाबू', 'जागृति' में ,
'रंग' जमाए रहते थे !
सबकी 'कुंडली' जग जाती थी,
जहाँ 'पधारे' रहते थे !
साईकिल पर जब बैठ - बिठाते,
पूछूँ मैं कुछ दिखता है?!
'प्रिय' भईया लहरके कहते,
'कुछ' नहीं क्या 'सूझता' है ?!
'तकलीफ़ें' भी 'मार' बजाती,
'भूख - प्यास' दबाती थी !
'ड्रेस' सहेजते - 'प्रॉप्स' बदलते,
'भूल - चूक' हो जाती थी !!
जन्मजाति टीका पहिनें,
प्रदीप दादा भाते थे !
'तरुण' दादा 'गाँधी' बनकर,
'अश्रुपात' कराते थे !
डांस - ड्रामा - स्क्रीनप्ले भी,
ज़बरन खींच ले जाती थी !
अशोक दादा, गौतम दादा,
'बाऊदी लोग' सराहती थी !
विनीत भईया, श्रीकांत भईया,
उनका 'वे ' कुछ हटकर था!
उनको देख - देखके मंशा,
अपने अंदर डटकर था!
'दो भईया 'और जीवट थे,
"मुक्तिपर्व" खिलवाते थे !
'पंकज भईया' नाच - नचाते,
'मनोज वर्मा' गाते थे !
लाईट बूथ पर 'राज कुमार',
अपना 'राज' चलाता था!
संजय इलेक्ट्रिकल बड़ा टेक्निकल,
मिलकर 'रंग' जमाता था !
घंटों चलता 'कम्पोजीशन',
'सुर - ग्राफ़' में रमना था !
कहीं जो होते 'हम', 'बेसुरे' ,
'शापित' होकर मरना था !
रात भर पोस्टर चिपकाते,
'आँखें मलते' रहना था !
'टिकट बेंचो', चंदे लाओ,
'फांकाकशी' में जीना था !
अंजनी भाई के घर पहुंचता,
एस. सी.आर. टी. कैम्पस मैं...!
'मीठी' मोटी 'रोटी' खाता...,
पेट भरता 'पुरकस' मैं...!!
राजीव - सुमन, एक्टिव' जोड़ी,
जोड़े 'नाटक वालों' को...!
इस 'जोड़न' में जोड़ लिए थे ,
'दिन - महीनें - सालों' को...!!
आशिक़,मानू ,फ़रीद,एक्ससेक्ट्रा,
मनमोहक थीं कुछ 'क्लियोपेट्रा' !
नाटक में 'असंख्य' तत्व थे,
देखा - सीखा 'एक्स्ट्रा - एक्स्ट्रा' !!
'पवन सिंग जी', 'कैमरा' लेकर,
'डैशिंग फ़ोटो' तिरते थे !
लोग उनके 'इर्द - गिर्द' ही,
'भीड़' लगाए फिरते थे !!
'जावेद भईया', 'तन्नू भईया',
'आदर्श' भईया होते थे...!
गहराई से उनको सुनते,
हम सबको संजोते थे...!!
'बकरी' के 'युवक', 'सुब्रो जी',
'इंक़लाबी' भाते थे !
'बाबा' हम ,'काका'-'सोहैल' जी,
'मुरझाए' मुँह गाते थे !!
सोविनियर, न्यूज़, हैंडबिल ,
'राजीव श्री' एक खम्बा था !
'मोनार्क बाबू' हिम्मतवाले,
'हाथ' बड़ा ही 'लंबा' था !
'साईमन' बनें मनीष सिन्हा जी,
'तुनक मिजाज़ी' बनते थे !
'चिकने - चुपड़े' बन - पहनकर,
'सोनू जी' से लड़ते थे !
'नाट्य -विधा' का 'नाट्यसमागम',
'गुणीजनों' के साथ सनें हम !
'ज्ञान - गुरु' के इस 'संगम' से ,
एक से बढ़कर 'एक' बनें हम...!
घेरा' में 'इंसाफ़' हुआ फ़िर,
साल इक्क्यानवे का 'इतिहास' !
'ग्रुशा' रूबी , मंच छा गई,
'लंगट' का भी हुआ 'उपहास' !!
'प्रकांड - पंडितों' की 'शिक्षा' थी,
मुझको मिली भी 'भिक्षा' थी...!
'कैमरे ' के 'जीविकोपार्जन' में ,
उन सभी की ही 'दीक्षा' थी...!
'पावन दिन', 'रंग - संगत' के ,
ऐसे किसे बिसर जाऊं !
रग - रग में और अन्तर्मन में,
इन्हें सहेजे तर जाऊं !
कितने 'ताल - मेल' सहेजे,
'सतरंगी' थे दिन मेरे...!
जिनके आसपास सुनहरे ,
बिखरे ख़ाबों के डेरे ...!!
'मनमोहक' वो क्या 'पटना' था,
जिसको देखो सब अपना था!l
चकाचौंध 'माया' नगरी में,
ग़र 'सोंचें' तो, सब 'सपना' था !
कोई अब एक्टर बन गया ,
कोई तो निर्माता है !
'हमजोली' में 'रंग' जमाना,
कभी - कभी हो पाता है !
सालों साल जो ,गुज़र गए हैं,
बारी है निभाने की...!
'लेखा - जोखा' क्या करेंगे ,
जीने और लुभाने की...!
एक से बढ़कर एक हुए हम
फ़िर कैसी 'मायूसी' है !?
कई 'दशक' जब साथ गुज़ारें,
ये कैसी 'ख़ामोशी' है !?
'व्यू - फाइंडर' देख - देखकर,
'लाईट्स - फाइंडर' बना हूँ मैं !
'फ्रेमिंग' - 'प्लेसिंग' करते - करते ,
'लाईफ़- फाइंडर' बना हूँ मैं !
'पटनदेवी' की धरती पर ,
मैं अंकुरित हुआ था !
'मुम्बा माता' की गोद में,
कर्मक्षेत्र को छुआ था !
जीना - मरना है यहाँ पर...,
हे माता मुम्बा देवी !
हम सभी को,'सफल' बनाना,
जीवन भर का हूँ सेवी !
- देवाशीष सरकार
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