मुद्दत बाद किसी ने....
मुद्दत बाद किसी ने,
मिरे दीदों में आके झाँका,
यूँ समझो यारो मुझे,
'लाखों - करोड़ों' में आँका !
जाहे क़िस्मत मिरे दिल की बातें ,
सुहानी शाम और उनकी सौग़ातें
अभी ताज़ी थी जैसे मिरी कहानियां,
उनकी 'तड़प' में 'तलब' बढ़ातें
हिली ज़मीं भी थी,
आसमाँ आँका - बाँका...
यूँ समझो यारो मुझे,
'लाखों - करोड़ों' में आँका !
मुद्दत बाद किसी ने,
मिरे दीदों में आके झाँका...
ख़त्म हुई थी कहकहे - हर बंदिश,
जो रचाई ग़ैरों ने तंग दिल से रंजिश!
ख़ुदा बचाए मिले न कभी किसी को...,
मुक़ाम - ए - हक़ में बनी - बनाई थी साज़िश
बोलता था मिरे लिए,
चौराहे - हर नाका
यूँ समझो यारो मुझे,
'लाखों - करोड़ों' में आँका !
मुद्दत बाद किसी ने,
मिरे दीदों में आके झाँका...
ज़िंदादिली थी ,
उनकी लबों में भी, थी ख़ुशबू
हुए बाग़ - बाग़ उनसे,
हुए जो हम कल उनसे रूबरू
टिमटिमाती रोशनी की आतिशबाज़ियाँ
बलखाती आई, कुछ करती गुफ़्तगू
रफ़्तार-ए- हस्र को भागती गश्त ने फाँका
मुद्दत बाद किसी ने,
मिरे दीदों में आके झाँका...
-- देवाशीष सरकार
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