“ बचपन के दिन ”

“ बचपन के दिन ”

कहाँ गए बचपन के दिन,
खुले आकाश के नीचे, 
दीवारें और दरीचे!
दौड़ा था – पछाड़ा था - पिरोया था,
अनगिनत चाहतों को, 
लथ – पथ पसीनों में...
        
‘बिड़ला मंदिर’ की सुबह
'सब्ज़िबाग़' की शाम
‘हमजोली’ में,
अटकेलियों में
रूठने – पढ़ने – खेलने,
‘मछुआटोली’ में !
या ‘भंवरपोखर’ की गलियों में...

कटी हुई पतंग लूटने,
केले, कदम, निमकौड़ी बाँचने...!                      
सदाबहार - ख़ुशनुमा अंदाज़ ,
‘दशहरा’–‘दिपावली’–‘होली’ में !
न ‘भाषा’ थी - कोई विरोध था,
हमलोगों में ‘प्रमोद’ था !
लिखने-पढ़ने और ख़ाबों को बुनानें में,
‘चाशनी’ में डुबोयी,
क्लासेज़ की ‘फुलझड़ियों’ में...!
                 
बचाया कुछ भी न था ,
‘झोली’ ख़ाली थी !
एक ही जान ...,
एक ही साँस बनकर जी रहे थे...!
अपनी - अपनी उमंग में,
‘वर्ज़िशें' भी ख़ूब की थी - हमनें,
तेज़ क़दमों से चलकर,
‘गाँधी-संग्रहालय’ के क़रीब,
उस पार्क में...!

क्या ‘मुनासिब’ नहीं है - अभी...,
उन्हें याद की जाए...?
क्यों न , हम आज के 'रिकॉर्डर'
उम्दा ‘स्कैनर’ बन जाएं ! 
और फ़िर से जिएं , 
उन्हीं हँसने की चीज़ों में...!
एक बार फ़िर, - देख - देख उछलें,
फूलें नहीं समाएं...,
ख़ाबों के उस ज़माने में !!!
                                                                         -- देवाशीष सरकार.

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