इक़बाल का मलाल था (कविता)

 इक़बाल का मलाल था

 बहशी ज़िन्दगी से...

 इक़बाल का बवाल था,

 बस दरिंदगी से...


ख़ुदा हैं हममें - तुममें

यह सारे जानते हैं !

ये कैसे लोग हैं ज़ाहिल ,

कुछ और ही मानते हैं !!

ये देश - धर्म - पूजा 

है अपनी बन्दगी से...

क्या बच नहीं सका था,

वो ऐसी गन्दगी से...


सब रोने वाले रोए 

हैं बार बार कबतक

महसूस दिल को होता

इंसानियत हो जबतक

सब 'मज़में - तग़में' ख़ारिज़

अब जी लो दिल्लगी से...

हो तुम्हीं सबके 'हाफ़िज़'

कुछ बदलो ज़िन्दगी से...


- देवाशीष सरकार


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