'पारस पत्थर' से 'दोस्त' - (कविता)
'पारस पत्थर' से 'दोस्त'
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'पारस पत्थर' से दोस्त हो,
तुम सभी ...!!!
तुम्हें भूल सकूं भी , तो कैसे... ???
अपने 'दायरे' में,
क़ैद पड़ा हूँ...!!!
कैसे 'तौल' सकूंगा,
अपने चंद 'पैसों' से...???
'उमर' - 'होने' को है,
'अकड़' ढ़ीली पड़ गई
'घुटने और 'कमर' की...!
कमज़ोर नज़रें , उदर में 'अपच',
कभी 'उस्म', 'ठंडी', बसंत बहार,
धू - धू , धधकती आग,
उसपे 'कहर' , 'समर' की...!!
'अफ़सोस' नहीं कोई ,
बस, 'एहसास' सा होता है...!
जब 'रात' में कोई,
तुम्हारी ही 'यादों' के पलों में;
तुम्हें 'बांचता' हुआ सोता है...!!
न होते तुम सभी...,
तो , मैं भी होता 'गर्दिश' में कहीं!
तुम्हारी 'छुअन' से ही,
'सोने' का बना हूँ अभी...!!
सुन लो भई , मेरी आख़री बात,
अबकी बार 'बारिश' के दिन... ,
'आसमान' में देखते रहना...!
कोई 'पत्थर' , 'अजूबा' सा
फ़िर से आ टपकेगा...!!
जिसे 'छुला' सको तो,
'दिल' से छुला लेना...,
तुम्हारा 'सख़्त दिल' ;
'सोने' में जा बदलेगा...!!!
'तोला - तोला' वजनदार ,
जो 'महँगें' भी होंगे ,
दिखेंगे भी 'चमकदार'
जो मेरी 'अहमियत' को, 'पसार' देगी...!
'मिटा' जाएंगी ...
'बचपन' की 'कहानियाँ'...,
यादें भी , 'मिटार' देगी...!!
-- देवाशीष सरकार
बहुत ही खूबसूरत,शानदार कविता लिखी है, मेरा बहुत आशीष,और प्यार, बहुत तरक्की करो।
जवाब देंहटाएंआपकी बातें सर - आखों पर रहेंगी ! आपको मेरा प्रणाम..., अपने वरद हस्तों से आशीर्वाद बनाए रखियेगा !
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