जब साँस नहीं तब आस कहाँ...(कविता )
जब साँस नहीं , तो आस कहाँ,
कोई बात नहीं , अहसास नहीं !
अब साँस रूके , तब साँस रूके,
दुनियाँ में कुछ भी रास नहीं !
साँसें बिकती है रोज़ यहाँ,
जब कोई मसीहा मिलता है !
ऐ नाथ मेरे, बस साथ तेरे
कोई अंग - अंग को सिलता है !
सब लाश हो तुम, क्या लाश यहाँ
क्या हमदर्दी कुछ पास नहीं
जब साँस नहीं , तो आस कहाँ,
कोई पास नहीं , कुछ ख़ास नहीं !
अब साँस रूके , तब साँस रूके,
दुनियाँ में कुछ भी रास नहीं !
अपनी साँसों की गिनती में
हक़ और किसी का छीनते हो
मौक़े - मौक़े को ढूंढ - ढूंढ,
पापों को इसमें बीनते हो ?!
क्या और कहीं ,कोई 'ठौर' यहाँ,
जो दीन - धरम हो ख़ास वहीं
जब साँस नहीं , तो आस कहाँ,
कोई पास नहीं , कुछ ख़ास नहीं !
अब साँस रूके , तब साँस रूके,
दुनियाँ में कुछ भी रास नहीं !
प्रकृति की जड़ से मत खेलो,
क्या पेड़ - परिंदे चीज़ नहीं !
अब 'रब' से थोड़ा 'डर' भी लो,
'निश्छेद' नहीं , कोई 'तीज' नहीं !
जीते हैं सभी, क्यों ख़ुद में यहाँ ,
मरते - मरते कोई 'दास' नहीं
जब साँस नहीं , तो आस कहाँ,
कोई पास नहीं , कुछ ख़ास नहीं !
अब साँस रूके , तब साँस रूके,
दुनियाँ में कुछ भी रास नहीं !
अपनी उमंग में जीते हुए,
जीवों को फ़िर क्यूँ दलते हो !
अदृष्य 'विषाणु' जनते हुए,
फ़िर इसी 'धरा' में पलते हो !
'आस्तिकता' है तो, है भी 'कहाँ',
क्या 'पूजा' यहॉं 'अरदास' कहीं !
जब साँस नहीं , तो आस कहाँ,
कोई पास नहीं , कुछ ख़ास नहीं !
अब साँस रूके , तब साँस रूके,
दुनियाँ में कुछ भी रास नहीं !
लाल रंग से बना - रमा ,
'ड्रैगन' - 'बहशी' तू 'ख़ूनी' है !
सारी दुनियाँ अब जान चुकी,
तू भी कितना 'बातूनी' है !
अंत 'काल' अब आ ही गया
मिट जाएगा तू उसी ज़मीं
उल्टी - सीधी हर बात करे
खा ले दिल है जो 'आस' वहीं...!
जब साँस नहीं , तो आस कहाँ,
कोई पास नहीं , कुछ ख़ास नहीं !
अब साँस रूके , तब साँस रूके,
दुनियाँ में कुछ भी रास नहीं !
-- देवाशीष सरकार
वाकई बहुत सुंदर कविता... हार्दिक बधाई शुभकामनाएं
जवाब देंहटाएंबहुत - बहुत शुक्रिया ...!!
हटाएंबहुत - बहुत स्वागत है, आपका...!!!