ठिकाना
इक दोस्त ने फ़ोन पर ,
'हताश' होते हुए कहा कि...,
"अपने 'सामानों' को 'बाँधे' हुए,
यही 'सोंच' रहा हूँ...!
कि, जब 'कोई' , 'कहीं' का ,
'नहीं' रह जाता तो,
'कहाँ' का 'रह' जाता है...???"
मैंने भी इत्मिनान रखते हुए कहा कि...,
"हम सभी 'ईश्वर की गोद' में हैं,
और यही हमारा स्थाई 'ठिकाना' है !
हमें 'कर्म' करते रहना चाहिए,
जब हम 'फलीभूत' हो जाएंगे;
तो 'यही' लोग...,
पास आकर 'इतरायेंगे'...!
'एक - की - दस' कहानी बनाएंगे !
तब 'हमारा' पता भी 'बदल' जाएगा,
लोग हमारे लिए भटकेंगे...,
और ढूंढते रह जाएंगे!!!
-- देवाशीष सरकार
उत्कृष्ट रचना..! सहृदय धन्यवाद..!
जवाब देंहटाएं