बून्द - बून्द
तेरे बोतल की बून्द - बून्द से
मेरा 'जाम' कुछ 'आम'
नहीं रह जाता ...!
उसकी नियत उमड़ आती है,
हलक़ से ढ़लक जाने पर,
उसकी सूरत निखरकर आती है
मेरे बहक आने पर ,
दुल्हन की अदाओं में आ जाती है,
कभी खफ़ा होती है तो...
रफ़ा - दफ़ा कर डालती है,
मेरे जाम के हर इक कतरे में,
उन्हीं बूंदों की ही तो ख़ुबी है...!
बाहें फैलाए आगोश में लेने को...,
अपनी ख़ुशबूओं से बुलाती है...!
गुदगुदी से भरे गुब्बारे में,
अपने हुस्न - ओ - अदा से
लेबरेज़ मुझको उड़ाती है ...
उसी में समा जाने को इतराती है ...!
मैं लुफ्त अंदाज़ी में खोया
उसकी दहलीज़ पर,
हाज़िर - नाज़िर हो जाता हूँ
पर वक़्त आते ही...,
वो सुकूँ भारी नींद में,
सुला जाती है...!
- देवाशीष सरकार.
Nice poem sir.!
जवाब देंहटाएंThank You So Much... ❤️🌹🙏
जवाब देंहटाएं