छठ पूजा का वास्तविक महत्व क्या है?
कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष के षष्ठी को छठ पूजा मनाया जाता है , जिसे छठ पर्व या सूर्यषष्ठी व्रत की पूजा भी कहते हैं , यह एक आस्था का बड़ा पर्व है। जिसकी शुरुआत दीपावली के 6 दिनों बाद की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार 'षष्ठी देवी' को लोकभाषा में 'छठ माता' कहा जाता है, जो ऋषि 'कश्यप' तथा 'अदिति' की 'मानस पुत्री' हैं। इन्हें 'देवसेना' के नाम से भी जाना जाता है।
चार दिनों तक चलने वाला इस छठ पर्व से 'राजा प्रियव्रत' की एक पौराणिक कहानी जुड़ी हुई है।
इस पौराणिक कहानी के अनुसार 'छठ व्रत' यानि 'सूर्यपष्ठी व्रत' रखकर और विधि-विधान के साथ 'छठी माता की पूजा' करने के बाद 'राजा प्रियव्रत' का 'मृत' हो चुका 'पुत्र' वापस 'जीवित' हो गया था। रामायण और महाभारत में भी छठ पूजा से जुड़ीं कहानियां मिलती हैं!
छठ पर्व चार दिनों तक चलने वाला पर्व है ,यह नहाय खाए से शुरू होकर, खरना, संध्या अर्घ्य,
अंत में सूर्य भगवान को प्रात:कालीन अर्घ्यदान के पश्चात इसकी समाप्ति होती है !पुराणों के अनुसार जब ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना कर रहे थे, तब उन्होंने अपने आपको को दो भागों में विभाजित कर लिया था. एक भाग पुरुष और दूसरा प्रकृति बना दिया था! इसके बाद प्रकृति ने भी खुद को छह भागों में विभाजित कर लिया, जिसमें से एक भाग छठी मईया हैं. इसी तरह छठी मैया देवी मां का छठा अंश हैं जिन्हें प्रकृति की देवी कहा जाता है.
बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, कोलकाता, मुंबई तथा भारत के हरेक हिस्से में यह प्रमुख तौर पर मनाया जाने वाला 'महापर्व' है...!!!
चार दिनों के इस छठ त्योहार के लिए महीनों पहले से तैयारियां शुरू हो जाती हैं और इस प्रकृति की पूजा के पर्व के रूप में मशहूर 'छठ पर्व या छठ व्रत' में 'शुद्धता और पवित्रता' का बहुत ध्यान रखा जाता है!
साथ ही साथ व्रती को 36 घंटे तक निर्जला रहना होता है अर्थात् बिना पानी के सहना होता है इसलिए छठ व्रत बहुत कठिन भी होता है. मान्यता है कि छठ व्रत को पूरी पवित्रता और सच्चे मन से करने पर बड़ी से बड़ी मनोकामना पूरी हो जाती है और यह छठ व्रत 'सूर्य को अर्घ' देने और 'छठी मैया की पूजा' करने से ही पूरा होता है!
छठ पूजा की शुरुआत हमें कई पौराणिक कहानियों में मिलता है। पौराणिक कहानियों के अनुसार त्रेतायुग में माता सीता और द्वापर युग में द्रौपदी ने छठ पूजा का व्रत रखकर सूर्यदेव और छठी मईया को अर्घ दिया था!
आइए, छठ पूजा के इतिहास की शुरुआत की कहानी को विस्तारपूर्वक जानते हैं!
एक पौराणिक कथा के अनुसार 'राजा प्रियव्रत' के घर में मृत संतान पैदा हुआ जिसके जन्म से राजा प्रियव्रत बहुत दुखी थे क्योंकि उनको कोई संतान नहीं थी। उन्होंने महर्षि कश्यप को अपनी समस्या बताई। महर्षि कश्यप ने उन्हें 'पुत्रेष्टि यज्ञ' कराने की सलाह दी। यज्ञ के दौरान, आहुति के लिए बनाई गई खीर 'रानी मालिनी' को खाने के लिए दी गई। खीर खाने से रानी गर्भवती हुईं और उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन दुर्भाग्य से, वह बच्चा मृत पैदा हुआ।
राजा प्रियव्रत पुत्र के शव को लेकर श्मशान घाट चले गए और दुख में डूबकर वे अपना प्राण त्यागने ही वाले थे कि तभी ब्रह्मा जी की मानस पुत्री 'देवी षष्ठी' प्रकट हुईं। देवी ने राजा से कहा, "मैं सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हूँ, इसलिए मेरा नाम षष्ठी है। तुम मेरी पूजा करो और लोगों में इसका प्रचार - प्रसार भी करो। तुम हताश मत होना, तुम विधिवत मेरी आज्ञा का पालन करो, तुम फलीभूत होगे, तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूरी होगी !"
देवी षष्ठी के कहने पर, राजा प्रियव्रत ने कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को विधि-विधान से उनका व्रत किया और उसी षष्ठी देवी की कृपा से, उन्हें जल्द ही एक स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति हुई। राजा ने पुनः पुत्र की प्राप्ति के बाद नगरवासियों को 'षष्ठी देवी' का प्रताप बताया, उनकी कहानी को भी उजागर किया। तब से षष्ठी देवी की आराधना और उनके व्रत की शुरुआत हुई और यही 'सूर्यषष्ठी' का व्रत 'छठ पूजा' या 'छठी मईया के व्रत' के रूप में मनाया जाने लगा...!
'त्रेतायुग' में माता सीता और द्वापर युग में द्रौपदी ने इस छठ का व्रत का पालन किया था!
रामायण की कहानी के अनुसार जब रावण का वध करके श्री रामचंद्र जी, माता सीता जी और लक्ष्मण जी अयोध्या वापस लौटे, तब माता सीता ने कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन इसी 'छठ व्रत' या 'सूर्यषष्ठी व्रत' को
कुल की सुख-शांति के लिए रखा था और 'षष्ठी देवी' और 'सूर्यदेव' की आराधना की थी।
इसके अलावा 'द्वापर युग' में 'द्रौपदी' ने भी अपने पतियों की रक्षा और खोया हुआ राजपाट जो उन्होंने जू ए में हारा था! उनको वापस मिल जाने पर 'द्रौपदी' ने 'षष्ठी माता' का यह 'छठ व्रत' रखा था। जिसके पश्चात् उनकी मनोकामनाएं पूरी भी हुई थी!
प्राचीन काल की मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को करने से व्यक्ति की हर मनोकामनाएं पूरी हो जातीं हैं और घर-परिवार में खुशहाली भी बनी रहतीं हैं।इसके अलावा 'द्वापर युग' में 'द्रौपदी' ने भी अपने पतियों की रक्षा और खोया हुआ राजपाट जो जुये में उन्होंने हारा था! उनको वापस पाने के लिए 'द्रौपदी' ने 'षष्ठी माता' का यह 'छठ व्रत' रखा था। जिसके पश्चात् उनकी मनोकामना पूरी भी हुई थी!
मान्यतानुसार छठ व्रत को करने से व्यक्ति की हर मनोकामनाएं पूरी होतीं हैं और घर-परिवार में खुशहाली भी बनी रहतीं हैं।
परन्तु, मुख्य रूप से छठ व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु एवं सुखी जीवन की कामना के लिए भी रखती हैं।
वहीं ये व्रत संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाली महिलाओं के लिए भी खास माना जाता है। इस पर्व में सूर्य देव और छठी मैया की अराधना की जाती है। यह एक मात्र ऐसा व्रत है जिसमें चढ़ते सूरज की जगह, उगते हुए सूरज और डूबते सूरज की पूजा की जाती है। इस 'छठ पूजा' में 'छठी मैया' और 'सूर्यदेव' की 'पूजा-आराधना' का बड़ा महत्व है। यह 'छठी मैया' या 'षष्ठी देवी' , सूर्य देव की बहन हैं। इसलिए छठी मैया को प्रसन्न करने के लिए सूर्य देव की पूजा-अर्चना की जाती है।
इस पर्व के लिए कई दिनों पहले से ही पूरे घरों की साफ-सफाई की जाती है। चारों दिनों तक सात्विक भोजन किया जाता है। पहने दिन 'नहाए खाए' होता है, फिर जाकर 'खरना' होता है। दूसरे दिन सूर्यदेव को संध्या अर्घ्य दिया जाता है और चौथे दिन सुबह उगते हुए 'सूर्यदेव' को जल चढ़ाया जाता है।
दोस्तों ,यह पर्व धार्मिक मान्यतानुसार भारत का प्राचीनतम पर्व एवं व्रत है , आशा है कि, आप सभी इस पौराणिक 'सूर्यषष्ठी व्रत' या 'छठ पूजा व 'छठ व्रत' के बारे में विस्तृत जानकारी मिली चुकी होगी !
हमारी जनकारीयाँ कुछ शोध व अध्ययनों का आधार रहा है, अगर कुछ छुट गया हो, या फिर कोई भूल चूक रह गयी हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ ! आप सबका आभार..., आप सभी का बहुत - बहुत धन्यवाद...!
-- देवाशीष सरकार
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