संदेश

'पारस पत्थर' से 'दोस्त' - (कविता)

 'पारस पत्थर' से 'दोस्त' ---------------------------------   'पारस पत्थर' से दोस्त हो,   तुम सभी ...!!!   तुम्हें भूल सकूं भी , तो कैसे... ???   अपने 'दायरे' में,   क़ैद पड़ा हूँ...!!!   कैसे 'तौल' सकूंगा,    अपने चंद 'पैसों' से...???   'उमर' - 'होने' को है,   'अकड़' ढ़ीली पड़ गई 'घुटने और 'कमर' की...!   कमज़ोर नज़रें , उदर में 'अपच',    कभी 'उस्म', 'ठंडी', बसंत बहार,    धू - धू , धधकती आग,    उसपे 'कहर' , 'समर' की...!!   'अफ़सोस' नहीं कोई ,   बस, 'एहसास' सा होता है...!   जब 'रात' में कोई,   तुम्हारी ही 'यादों' के पलों में;    तुम्हें 'बांचता' हुआ सोता है...!!   न होते तुम सभी...,   तो , मैं भी होता 'गर्दिश' में कहीं!   तुम्हारी 'छुअन' से ही,   'सोने' का बना हूँ अभी...!!   सुन लो भई , मेरी आख़री बात,    अबकी बार  'बारिश' के दिन... ,   'आसमान' में देखते रहना...!    कोई 'पत्थर' , 'अजू...

मुद्दत बाद किसी ने....

 मुद्दत बाद किसी ने,  मिरे दीदों में आके झाँका, यूँ समझो यारो मुझे, 'लाखों - करोड़ों' में आँका ! जाहे क़िस्मत मिरे दिल की बातें , सुहानी शाम और उनकी सौग़ातें अभी ताज़ी थी जैसे मिरी कहानियां, उनकी 'तड़प' में 'तलब' बढ़ातें हिली ज़मीं भी थी, आसमाँ आँका - बाँका... यूँ समझो यारो मुझे, 'लाखों - करोड़ों' में आँका !            मुद्दत बाद किसी ने,               मिरे दीदों में आके झाँका... ख़त्म हुई थी कहकहे - हर बंदिश, जो रचाई ग़ैरों ने तंग दिल से रंजिश! ख़ुदा बचाए मिले न कभी किसी को..., मुक़ाम - ए - हक़ में बनी - बनाई थी साज़िश बोलता था मिरे लिए, चौराहे - हर नाका यूँ समझो यारो मुझे, 'लाखों - करोड़ों' में आँका !            मुद्दत बाद किसी ने,             मिरे दीदों में आके झाँका... ज़िंदादिली थी ,  उनकी लबों में भी, थी ख़ुशबू हुए बाग़ -  बाग़ उनसे, हुए जो हम कल उनसे रूबरू टिमटिमाती रोशनी की आतिशबाज़ियाँ बलखाती आई, कुछ करती गुफ़्तगू रफ़्तार-ए- हस्र को भागती गश्त ने ...

माँ ऐसी ही होती है...,

  माँ ऐसी ही होती है..., आँखें खोले सोती है...! कुछ भी वो बनाए खिलाए, अमृतमयी सी होती है ! उसके आँचल की महक में, हर पीड़ा जा खोती है...!                              माँ ऐसी ही होती है.... जिसकी गोद बड़ी सुखदायी, हम कहते थे 'माई - माई'...! जिम्मा भक्ति,और सलीके, धीरज,बोली, हिम्मत, सीखें, सब कुछ हममें बोती है !                                माँ ऐसी ही होती है.... रूठ गए तो झींगा मुश्ती, मुझे मनाने करती कुश्ती...! मेरे पग - पग, हर शैतानी, कर देती वो पानी - पानी...! थक जाने - बोझिल होने पर, तन्मयता सँजोती है...!                      माँ ऐसी ही होती है.... -- देवाशीष सरकार

माटी का बना हूँ ...

 माटी का बना हूँ ... ______________ माटी का बना हूँ ... 'मटमैला' समझना, मुझे 'संगेमरमर' का 'बुत' तो ना 'बन' पाऊँगा मैं... 'धरती' की 'ओज' से 'पैदा' हूँ, 'अडिग' और 'अटलबाज़' हूँ ...! 'सख़्त' पत्थरों सा 'बन' गया हूँ, 'मौसमी', 'ज़द्दोज़हद' हूँ , मैं...!! 'खाँटी' , 'बावला' भी हूँ ..., 'खुड़दुड़ा' समझना, मुझे... 'लख़्त-ए-जिगर' का 'खूँ' तो ना बन पाऊँगा , मैं...…            'माटी' का बना हूँ ...           'मटमैला' समझना, मुझे            'संगेमरमर' का 'बुत'            तो ना 'बन' पाऊँगा मैं... दुनियाँ के 'अज़िमोंशां', बादशाहों 'ज़राफ़ात' कतई नहीं हूँ ! मैं 'ताज़' हूँ बिना 'ताज़पोशी' के  'ख़ुराफ़ात' कतई नहीं हूँ, मैं...! 'ढाल' सा बना हूँ , इस 'क़दर' मज़बूती है मिरी... 'गोले' बरसाते - 'नलियों' वाली 'तोप' तो ना 'बन' पाऊँगा, मैं...           '...

इक़बाल का मलाल था (कविता)

 इक़बाल का मलाल था  बहशी ज़िन्दगी से...  इक़बाल का बवाल था,  बस दरिंदगी से... ख़ुदा हैं हममें - तुममें यह सारे जानते हैं ! ये कैसे लोग हैं ज़ाहिल , कुछ और ही मानते हैं !! ये देश - धर्म - पूजा  है अपनी बन्दगी से... क्या बच नहीं सका था, वो ऐसी गन्दगी से... सब रोने वाले रोए  हैं बार बार कबतक महसूस दिल को होता इंसानियत हो जबतक सब 'मज़में - तग़में' ख़ारिज़ अब जी लो दिल्लगी से... हो तुम्हीं सबके 'हाफ़िज़' कुछ बदलो ज़िन्दगी से... - देवाशीष सरकार

कुछ 'मुखड़े' मेरे भी हैं...!

  कुछ 'मुखड़े' मेरे भी हैं, हुक 'लाईनें' भी...! कुछ 'नगमें' मेरे भी हैं, कुछ 'आईनें' भी...! यूँ गुले बहार में, ख़ाब खिले फ़िर बिखरे मीरे चेहरे पर ,तिरे रंग और भी निखरे यादों के दरीचे में, बहती हवाओं में तिरी वफ़ाई में दौड़े - दौड़े और ठहरे कुछ 'मक़सद' मेरे भी हैं , कुछ 'माईनें' भी कुछ 'नगमें' मेरे भी हैं, कुछ 'आईनें' भी...! क्यूँ दिल लगाया, पलकों में जाके खोई, और शिक़वे में बहकर छुप - छुपाती रोई लिख न पाया सनम ख़य्याम की रुबाई...! यह कैसी सोहबत तेरी कैसी रुसबाई...!! कुछ 'जुमलें' मेरे भी हैं, कुछ 'लाईनें' भी कुछ 'नगमें' मेरे भी हैं, कुछ 'आईनें' भी...! किनारा मिले ना मिले, दूर तलक जाना है, नज़रें मिले ना मिले, अब यही हर्ज़ाना है क्यूँ मुझसे दूर रहकर मेरी ही सोंचती हो तुम्हारी इल्मियात पे रहना गुजर जाना है कई 'क़िस्में' मेरे भी हैं, 'मुआयनें' भी कुछ 'नगमें' मेरे भी हैं, कुछ 'आईनें' भी...! - देवाशीष सरकार
बहुत कम समय में ,बहुत ज़्यादा नाम कमाया था , उन्होंने...!!! इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में लिखा मिलेगा...! बिहार का गौरव - बिहार पर गर्व बना रहेगा !  जो अपनी रचनात्मकताओं को बारम्बार , अपनी क़ाबिलियाती के साथ टी.वी. के पर्दे और सिनेमाओं के पर्दों पर साबित करता हुआ ;  हमें याद दिलाता रहेगा  ! वह 'पंचतत्व' में विलीन होकर भी अपनी कृतित्व से अमर हो गया है ! वह आने वाले कई दशकों तक इक 'प्रेरणा' स्वरूप बन गया है ! पृथ्वी उसे मिटने न देगी और अपने कर्मों से वह हमें रह - रहकर 'याद' आएगा ! इन्हीं शब्दों के साथ 'ईश्वर' से 'कामना' करता हूँ कि , उस प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता एवं नायक "सुशांत सिंग राजपूत" की आत्मा को शांति प्रदान करें...!!! ॐ शाँति...,ॐ शाँति, ॐ शाँति...!!!